पानीपत(निर्मल सिंह): पुलिस अधीक्षक श्री भूपेंद्र सिंह आईपीएस के मार्गदर्शन में जिला पुलिस कर्मियों की कार्यक्षमता को सुदृढ़ बनाने और उन्हें विधिक प्रक्रियाओं के प्रति अधिक जागरूक करने के उद्देश्य से सोमवार को जिला सचिवालय स्थित पुलिस विभाग के सभागार में प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया गया।
डिप्टी डायरेक्टर ऑफ प्रासिक्यूशन राजेश चौधरी ने इस दौरान पर्यवेक्षण अधिकारियों, थाना प्रबंधकों, क्राइम युनिट प्रभारियों व चौकी इंचार्जों को अभियोग दर्ज करने से संबंधित नियमों एवं निर्देशों की जानकारी दी।
पुलिस अधीक्षक श्री भूपेंद्र सिंह आईपीएस ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की और प्रशिक्षण के महत्व बारे बताया। उन्होंने कहा कि एफआईआर दर्ज करना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि न्याय दिलाने की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है। यदि यह प्रक्रिया सही और पारदर्शी तरीके से की जाती है, तो इससे न केवल जांच की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि आमजन का पुलिस के प्रति विशवास भी मजबूत होता है। उन्होने कहा कि प्रत्येक अनुसंधानकर्ता पुलिस अधिकारी को अभियोग दर्ज करने से संबंधित नियमों एक निर्देशों की अच्छे से जानकारी होना बेहद जरूरी है।
डिप्टी डायरेक्टर ऑफ प्रासिक्यूशन राजेश चौधरी ने अभियोग दर्ज करने से संबंधित नियमों एवं निर्देशों की गहनता से जानकारी देकर सरल एवं स्पष्ट तरिके से समझाया। उन्होंने बताया कि सही, निष्पक्ष एंव समयबद्ध तरीके से एफआईआए दर्ज करना पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी है, और यह न्याय प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने बताया कि किसी भी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधानों के अनुसार तत्काल प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करना अनिवार्य है। एफआईआर दर्ज करते समय सूचना देने वाले की बात को सही रूप में लिखना, उसकी प्रति निःशुल्क उपलब्ध कराना तथा केस से संबंधित सभी आवश्यक विवरणों का उल्लेख करना आवश्यक है। कुछ अपवादों में जैसे घरेलू मामले, आर्थिक अपराध, करप्सन, चिकित्सा लापरवाही इत्यादी मामलों में जांच करके एफआईआर दर्ज की जा सकती है।
डिप्टी डायरेक्टर ऑफ प्रासिक्यूशन राजेश चौधरी ने इस दौरान माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 12 नवंबर 2013 के ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के जजमेंट के बारे भी बताया। प्रशिक्षण शत्र में उपस्थित पुलिस अधिकारियों ने विषय पर अपनी जिज्ञासाएं भी रखीं, जिनका विशेषज्ञों द्वारा समाधान किया गया।
मुख्य बिंदु:
अनिवार्य पंजीकरण: यदि प्राप्त जानकारी संज्ञेय अपराध को दर्शाती है, तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।
प्रारंभिक जांच: केवल तभी अनुमति है जब यह स्पष्ट न हो कि संज्ञेय अपराध हुआ है या नहीं।
समय सीमा: यदि प्रारंभिक जांच होती है, तो इसे 7 दिनों के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
दंडात्मक कार्रवाई: एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।